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चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी की मुख्य वजह बाजार की धारणा है, न कि एथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने का उपयोग: उद्योग संगठन

Source : business.khaskhabar.com | Aug 24, 2026 | businesskhaskhabar.com Commodity News Rss Feeds
 market sentiment not the use of sugarcane for ethanol production is the primary reason for the rise in sugar prices industry body 839179
बिजनेस डेस्क। नई दिल्ली 


हाल ही में चीनी की कीमतों में आई तेजी को लेकर एथेनॉल उत्पादन को जिम्मेदार ठहराए जाने के दावों को खारिज करते हुए ग्रेन एथेनॉल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (जीईएमए) ने कहा है कि कीमतों में बढ़ोतरी का मुख्य कारण बाजार की धारणा और आगामी गन्ना फसल को लेकर बनी अनिश्चितता है, न कि एथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने का उपयोग। 


जीईएमए के अध्यक्ष डॉ. सी.के. जैन ने कहा कि वर्तमान स्थिति में चीनी की उपलब्धता पर एथेनॉल उत्पादन का कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी को एथेनॉल कार्यक्रम से जोड़ना सही नहीं होगा। 


डॉ. जैन ने बताया कि बाजार की वास्तविक स्थिति को समझने के लिए चीनी मिलों से निकलने वाली कीमत (एक्स-मिल प्राइस) और खुदरा बाजार में उस पर लगने वाले अंतर को देखना जरूरी है। उनका कहना है कि जब बाजार मूल्य और एक्स-मिल मूल्य के बीच अंतर अधिक हो जाता है, तो यह संकेत देता है कि कीमतें वास्तविक कमी से ज्यादा बाजार की मनोवैज्ञानिक धारणा और अटकलों से प्रभावित हो रही हैं। उन्होंने कहा, "एथेनॉल उत्पादन का चीनी की कीमतों में वृद्धि से कोई संबंध नहीं है। बाजार में चीनी की कीमतें पूरी तरह भावना-आधारित हैं।" 


जीईएमए अध्यक्ष ने कहा कि संगठन सरकार के इस आकलन से "100 प्रतिशत सहमत" है कि एथेनॉल उत्पादन को चीनी की कीमतों में वृद्धि के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि एथेनॉल आपूर्ति वर्ष 2025-26 के लिए गन्ने के उपयोग को लेकर निर्णय सितंबर 2025 में लिया गया था। उस समय अनुमान था कि लगभग 30 लाख टन चीनी अतिरिक्त रूप से भंडारण में जा सकती थी, जिसे एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल कर ऊर्जा क्षेत्र की जरूरतों को पूरा किया जा सकता था। हालांकि इसके बाद अत्यधिक बारिश, गन्ने में रेड रॉट रोग और कई क्षेत्रों में जलभराव जैसी परिस्थितियों ने गन्ने और चीनी उत्पादन को कुछ हद तक प्रभावित किया। 


इसके बावजूद डॉ. जैन का कहना है कि उत्पादन में आई कमी इतनी नहीं है कि बाजार में वास्तविक कमी की स्थिति पैदा हो जाए। उन्होंने कहा, "आज भी चीनी मिलों के पास पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है। भंडार में कोई कमी नहीं है।" साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि नई पेराई सीजन की शुरुआत के साथ अधिकांश चीनी मिलें 15 अक्टूबर से परिचालन शुरू कर देंगी, जिससे आपूर्ति और मजबूत होगी। 

डॉ. जैन ने चीनी उद्योग की लागत संरचना की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि चीनी की कीमतों का सीधा संबंध किसानों को दिए जाने वाले उचित एवं लाभकारी मूल्य (एफआरपी) से है। सरकार हर वर्ष गन्ने का एफआरपी बढ़ाती है, जिससे चीनी मिलों की कच्चे माल की लागत लगातार बढ़ती है। इसके विपरीत, उन्होंने बताया कि चीनी का न्यूनतम विक्रय मूल्य (एमएसपी) पिछले आठ वर्षों से नहीं बढ़ाया गया है। उनके अनुसार, यही वर्तमान व्यवस्था की सबसे बड़ी विसंगति है। उन्होंने कहा, "यह हमारे तंत्र की एक खामी है, जिसे दूर किए जाने की आवश्यकता है।" 

जीईएमए अध्यक्ष ने इस बात पर जो दिया कि नीति निर्माण में किसानों, चीनी मिलों और उपभोक्ताओं, तीनों के हितों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि गन्ना किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिलना चाहिए, चीनी उद्योग को आर्थिक रूप से टिकाऊ बने रहने का अवसर मिलना चाहिए और उपभोक्ताओं को भी उचित कीमत पर चीनी उपलब्ध कराई जानी चाहिए। -आईएएनएस

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