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चीनी के दाम घटे, मगर मिठाई नहीं हुई सस्ती!

Source : business.khaskhabar.com | May 17, 2018 | businesskhaskhabar.com Commodity News Rss Feeds
 sugar prices decreased but the sweets were not cheap! 313814नोएडा। देश में चीनी का रिकॉर्ड उत्पादन होने से घरेलू बाजार में चीनी का थोक मूल्य लागत से कम हो गया है मगर सस्ती चीनी का जायका उपभोक्ताओं को नहीं मिल रहा है। थोक में चीनी खरीदने वाले कन्फेक्शनरी उद्योग ने अपने उत्पादों के दाम में कोई कटौती नहीं की है। उपभोक्ताओं की शिकायत है कि चीनी तो सस्ती हुई मगर मिठाई सस्ती नहीं हुई। कुछ जगहों पर चीनी का खुदरा मूल्य चीनी थोक मूल्य के दोगुने से भी ज्यादा है। उपभोक्ताओं को लग रहा है कि उपकर लगने से उनके ऊपर और महंगाई की मार पड़ेगी।

ग्रेटर नोएडा में रहने वाली शालिनी को लगता है कि चीनी पर अगर उपकर लगाया जाएगा तो उसका बजट और बिगड़ जाएगा। वह कहती है कि मॉल में बिक रही ब्रांडेड चीनी अभी 60-70 रुपये प्रति किलोग्राम है अगर चीनी के भाव में किन्हीं वजहों से बढ़ोतरी हुई तो फिर यह कहीं 70-80 रुपये प्रति किलोग्राम न हो जाए। यह चिंता सिर्फ ग्रेटर नोएडा की शालिनी की नहीं है, बल्कि देश के अन्य शहरों की गृहणियों की भी है जो महंगी चीनी ही खरीदती रही हैं।

मुंबई के मीरारोड इलाके की एक सोसायटी में रहने वाली तृप्ति ने फोन पर बताया कि वह ब्रांडेड चीनी 48 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से खरीदती है और अगर उपकर लगता है तो भाव निश्चित रूप से बढ़ेगी। तृप्ति ने कहा, ‘‘रोज सुनती आ रही हूं कि चीनी की कीमत घट गई है लेकिन यहां तो ब्रांडेड चीनी हो या मिठाई या फिर बिस्कुट या अन्य कोई कन्फेक्शनरी आइटम यहां तक कि कोल्ड ड्रिंक्स चीनी के दाम घटने से किसी भी चीज के दाम में कोई कमी नहीं आई। यह सरासर उपभोक्ताओं के साथ नाइंसाइफी है।’’

ग्रेडर नोएडा इलाके की एक जनरल स्टोर में एक खास ब्रांड की चीनी के पांच किलोग्राम की पैकेट की अंकित कीमत 345 रुपये पाई गई। एक अन्य ब्रांड की पांच किलोग्राम की पैकेट 325 रुपये की थी। पास की एक दूसरी जनरल स्टोर में खुली बोरी की चीनी 44 रुपये प्रति किलोग्राम थी। दिल्ली के मंडावली इलाके की एक दुकान में बुधवार को चीनी 30 रुपये प्रति किलोग्राम थी।

दिल्ली के शाहदरा इलाके स्थित चीनी के डीलर सुशील कुमार ने बताया कि उत्तर प्रदेश की चीनी मिल का अधिकतम एक्स मिल रेट बुधवार को 2680-85 रुपये था। इस पर पांच फीसदी जीएसटी और अन्य खर्च करीब 135 रुपये और 60 रुपये प्रति क्विंटल की दर से ढुलाई खर्च जोडऩे के बाद दिल्ली में चीनी 2880-85 रुपये पर डीलर के पास उपलब्ध होता है, जिसे वह 2910-2950 रुपये पर बेच रहा है। उन्होंने बताया कि डबल रिफाइंड चीनी भी दिल्ली में खुले में कहीं 3000-3100 रुपये प्रति क्विंटल से ज्यादा नहीं है।

बंबई मर्चेंट शुगर एसोसिएशन से प्राप्त रेट के अनुसार, मुंबई में बुधवार को एस-ग्रेड चीनी 2610-2751 रुपये प्रति क्विंटल और एम-ग्रेड की चीनी 27700-2882 रुपये प्रति क्विंटल थी। नाका डिलीवरी भाव एस-ग्रेड 2575-2645 रुपये प्रति क्विंटल और एम-ग्रेड 2645-2725 रुपये प्रति क्विंटल थी।

उत्तर प्रदेश के एक बड़े चीनी उत्पादक ने ईमेल के जरिए बताया कि उनकी ब्रांडेड चीनी का भी एक्स मिल रेट महज 31.50 रुपये प्रति किलोग्राम है। इस दर पर वह अपने वितरकों को अपने ब्रांड की चीनी मुहैया करवाते हैं।

खुले चीनी के भाव के मुकाबले ब्रांडेड चीनी महंगी होने पर देश के चीनी उद्योग की शीर्ष संस्था इंडियन शुगर मिल्स एसोएिशन (इस्मा) के महानिदेशक अविनाश वर्मा ने कहा, ‘‘ब्रांडेड चीनी प्रीमियम क्वालिटी की चीनी है जिसके साथ खास ब्रांड का वैल्यू भी जुड़ा होता है। इसके अलावा उस पर उत्पादन, पैकेजिंग व अन्य लागत भी है, जिसके कारण उसका मूल्य अधिक होता है।’’

मगर, दोगुने भाव पर चीनी बिकने की बात से उन्होंने भी इनकार किया और कहा कि भाव में इतना बड़ा अंतर नहीं हो सकता है।

वर्मा ने बताया कि देश के कुल चीनी उत्पादन के करीब 8-10 फीसदी परिमाण का उपयोग ब्रांड के तौर पर किया जाता है। उन्होंने कहा, ‘‘इसकी प्रोसेसिंग के लिए जो मशीन आती है उसकी लागत भी काफी ज्यादा होती है। इस चीनी को उत्पादन से पैकेजिंग के किसी भी स्तर पर हाथ से स्पर्श नहीं किया जाता है। जाहिर है कि इस पर लागत ज्यादा होने के कारण इसकी कीमत ज्यादा होती है।’’

इस्मा के अनुसार, 30 अप्रैल 2018 तक देशभर में चीनी का उत्पादन 310 लाख टन से ज्यादा हो चुका था और चालू सत्र 2017-18 (अक्टूबर-सितंबर) में कुल उत्पादन 315-320 लाख टन हो सकती है।

मिलों के अनुसार चीनी का वर्तमान मिल रेट लागत के मुकाबले करीब आठ-नौ रुपये किलोग्राम कम है। यही वजह है कि मिलें नकदी की समस्या से जूझ रही है और गन्ना उत्पादकों का बकाया करीब 22,000 करोड़ रुपया हो गया है।

सरकार ने चीनी मिलों को राहत देते हुए 55 रुपये प्रति टन की दर से एफआरपी के हिस्से के तौर गन्ना उत्पादकों को सीधे उनके खाते में भुगतान करने का फैसला लिया।
(आईएएनएस)

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