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बांग्लादेश: ईरान संघर्ष का असर, ईंधन और खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ीं

Source : business.khaskhabar.com | Apr 05, 2026 | businesskhaskhabar.com Commodity News Rss Feeds
 bangladesh impact of iran conflict—fuel and food prices rise 803755नई दिल्ली। ईरान संघर्ष का असर बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था पर भी दिखने लगा है। द डेली स्टार की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ईंधन, उर्वरक, माल ढुलाई और विदेशी मुद्रा जैसे अहम क्षेत्रों पर दबाव बढ़ रहा है।

 

भले ही बांग्लादेश इस संघर्ष क्षेत्र से भौगोलिक रूप से दूर है, लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था से गहरे जुड़ाव के कारण इसका असर तेजी से महसूस हो रहा है।

इस व्यवधान का सबसे बड़ा कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज है, जहां से दुनिया के लगभग पांचवें हिस्से का तेल और एलएनजी गुजरता है। इस मार्ग में किसी भी तरह की बाधा ऊर्जा आपूर्ति, शिपिंग और उर्वरक की उपलब्धता को प्रभावित करती है, जो कृषि के लिए बेहद जरूरी हैं।

वैश्विक बाजार में इसका असर दिखने लगा है। कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी है, एलएनजी की आपूर्ति में देरी हो रही है और माल ढुलाई की लागत बढ़ रही है। उर्वरकों की कीमतों में भी उछाल देखा जा रहा है, जिससे खाद्य उत्पादन पर खतरा मंडरा रहा है।

बांग्लादेश के लिए ये सभी झटके एक साथ आ रहे हैं। ऊर्जा की बढ़ती लागत बिजली और परिवहन की कीमतों को ऊपर ले जा रही है, जबकि महंगे उर्वरक कृषि लागत को बढ़ा रहे हैं। इसके साथ ही माल ढुलाई महंगी होने से आयात लागत में भी इजाफा हो रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि समस्या सिर्फ कीमतों में वृद्धि की नहीं है, बल्कि इन जरूरी वस्तुओं की उपलब्धता भी चिंता का विषय बनती जा रही है।

ईंधन, उर्वरक या शिपिंग में किसी भी तरह की कमी अर्थव्यवस्था को कीमतों से भी ज्यादा नुकसान पहुंचा सकती है। आयात महंगा हो रहा है, इससे निर्यात और प्रवासी आय (रिमिटेंस) पर भी दबाव पड़ सकता है, खासकर अगर खाड़ी देशों के श्रम बाजार कमजोर होते हैं।

सरकार पर वित्तीय दबाव भी बढ़ रहा है। वैश्विक ईंधन कीमतों का पूरा असर जनता तक न पहुंचे, इसके लिए सब्सिडी दी जा रही है, जिससे सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ रहा है। वहीं, कमजोर कर संग्रह के कारण अतिरिक्त राहत देने की गुंजाइश सीमित हो गई है।

ऊर्जा और उर्वरक की बढ़ती लागत का असर परिवहन और खाद्य कीमतों पर पड़ रहा है, जिससे “कॉस्ट-पुश” महंगाई की स्थिति बन रही है। ऐसी स्थिति में केवल मौद्रिक नीति से महंगाई को नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है और सरकार को महंगाई तथा आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।

रिपोर्ट के अनुसार, वित्तीय क्षेत्र पर भी इसका असर पड़ सकता है। यदि आर्थिक गतिविधियां धीमी होती हैं तो पहले से कमजोर बैंकिंग व्यवस्था पर और दबाव बढ़ सकता है, जिससे व्यापक आर्थिक स्थिरता के लिए नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।

--आईएएनएस

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