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यूपीआई पर शुल्क लगाने के फैसले को वापस ले सरकार : सीपीआई

Source : business.khaskhabar.com | Sep 16, 2026 | businesskhaskhabar.com Business News Rss Feeds
 government should withdraw the decision to impose fees on upi cpi 845179
बिजनेस डेस्क। नई दिल्ली 

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) ने यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगाए जाने के फैसले की कड़ी आलोचना करते हुए केंद्र सरकार से इसे तत्काल वापस लेने की मांग की है। पार्टी का कहना है कि यूपीआई एक सार्वजनिक डिजिटल भुगतान व्यवस्था है, जिसे आम जनता की सुविधा के लिए विकसित किया गया था और इसे शुल्क आधारित व्यवस्था में बदलना जनविरोधी कदम है। 

सीपीआई के राष्ट्रीय सचिवालय द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि सरकार भले ही यह दावा कर रही हो कि उपभोक्ताओं पर सीधे कोई शुल्क नहीं लगाया जाएगा लेकिन व्यावहारिक अनुभव बताता है कि व्यापारी अक्सर ऐसे अतिरिक्त खर्चों का बोझ अंततः ग्राहकों पर डाल देते हैं। 

पार्टी के अनुसार, 10 और 10000 रुपए के भुगतान को संसाधित करने की लागत में कोई खास अंतर नहीं होता, इसलिए लेनदेन राशि के आधार पर शुल्क लगाना तर्कसंगत नहीं है। बयान में कहा गया कि नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) पहले से ही एक आर्थिक रूप से मजबूत संस्था है, जिसके पास पर्याप्त नकद भंडार और निवेश हैं। साथ ही, उसने सरकार को करोड़ों रुपए कर के रूप में भी दिए हैं। ऐसे में यूपीआई को राजस्व कमाने का माध्यम बनाने का कोई औचित्य नहीं है। 

सीपीआई ने आरोप लगाया कि इस निर्णय के पीछे अमेरिकी दबाव की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पार्टी का दावा है कि अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि ने भारत की यूपीआई और शून्य एमडीआर व्यवस्था पर आपत्ति जताते हुए इन्हें अमेरिकी भुगतान कंपनियों के लिए बाधा बताया है। 

सीपीआई के अनुसार, वीजा और मास्टरकार्ड जैसी कंपनियों का हित कार्ड आधारित भुगतानों को बढ़ावा देने और यूपीआई तथा रुपे को कम आकर्षक बनाने में निहित है। पार्टी का कहना है कि 2000 से अधिक के लेनदेन यूपीआई मर्चेंट ट्रांजैक्शनों के कुल मूल्य का लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा हैं और अब इन्हीं लेनदेन पर शुल्क लगाने की तैयारी की जा रही है। 

सीपीआई ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार देश के हितों की रक्षा करने के बजाय अमेरिकी दबाव के आगे झुक गई है। सीपीआई ने प्रधानमंत्री मोदी द्वारा यूपीआई को "डिजिटल इंडिया" की सफलता का प्रतीक बताए जाने का उल्लेख करते हुए कहा कि विदेशी दबाव में इसकी स्वायत्तता से समझौता करना देश की डिजिटल संप्रभुता पर धब्बा है। 

पार्टी के अनुसार, इससे अंततः व्यापारियों और उपभोक्ताओं पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा जबकि लाभ विदेशी भुगतान कंपनियों को मिलेगा। बयान में कहा गया कि भारत के डिजिटल भुगतान तंत्र का बड़ा हिस्सा पहले ही वॉलमार्ट के स्वामित्व वाली फोनपे और अल्फाबेट के स्वामित्व वाली गूगल पे के हाथों में है, जो मिलकर लगभग 80 प्रतिशत यूपीआई लेनदेन का संचालन करती हैं। 

सीपीआई का आरोप है कि इन बड़ी कंपनियों से सार्वजनिक डिजिटल बुनियादी ढांचे के उपयोग का उचित शुल्क लेने के बजाय सरकार आम लोगों और छोटे व्यापारियों पर अतिरिक्त बोझ डालने का रास्ता अपना रही है। 

पार्टी ने जोर देकर कहा कि यूपीआई को सरल, एकीकृत और कम लागत वाली भुगतान व्यवस्था के रूप में विकसित किया गया था। इसे विदेशी कॉरपोरेट हितों के अनुरूप कमजोर नहीं किया जाना चाहिए। सीपीआई ने सरकार से इस "जनविरोधी निर्णय" को वापस लेने और यूपीआई को पूरी तरह निशुल्क बनाए रखने की मांग की है। -आईएएनएस

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